BY : Pranjal Yadav

दुर्ग।छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार के कार्यकाल के दौरान शिक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल लगातार उठ रहे हैं। राज्य के कई सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी बताई जा रही है, जबकि विद्यार्थियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। कई विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षक नहीं होने के कारण एक शिक्षक को एक साथ 6-6 कक्षाएं लेने की मजबूरी है। इसके साथ ही पुस्तकों, स्टेशनरी, स्वच्छ पेयजल, शौचालयों की साफ-सफाई और अन्य बुनियादी सुविधाओं के लिए पर्याप्त बजट नहीं मिलने के आरोप भी सामने आ रहे हैं, जिससे शिक्षा व्यवस्था की जमीनी स्थिति पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
इसी क्रम में वरिष्ठ कांग्रेस नेता पूर्व विधायक अरुण वोरा ने आज दुर्ग के झाड़ूराम देवांगन शासकीय विद्यालय एवं तितुरडीह क्षेत्र स्थित स्वामी आत्मानंद अंग्रेजी माध्यम स्कूल का निरीक्षण किया। इस दौरान उन्होंने विद्यालय परिसर का जायजा लिया और विद्यार्थियों से बातचीत की।

दोनों स्कूलों में शिक्षकों की कमी की स्थिति सामने आई। जानकारी के अनुसार एक-एक शिक्षक को लगातार 5 से 6 कक्षाएं लेनी पड़ रही हैं, जिससे पढ़ाई की गुणवत्ता प्रभावित होने की बात कही जा रही है। बताया गया कि इन विद्यालयों में 800 से 900 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं, लेकिन शिक्षकों और संसाधनों की कमी के कारण उनके शैक्षणिक भविष्य को लेकर चिंता जताई गई।विद्यालयों में शौचालयों की स्थिति भी संतोषजनक नहीं पाई गई। साफ-सफाई के लिए प्रभावी बजट व्यवस्था न होने के कारण विद्यार्थियों के स्वास्थ्य पर असर पड़ने की आशंका जताई गई। इसके अलावा स्वच्छ पेयजल की सुविधा का अभाव भी सामने आया। न नियमित जल आपूर्ति की व्यवस्था है और न ही वाटर कूलर उपलब्ध हैं, जिससे बच्चों के बीमार पड़ने का खतरा बना रहता है।

तितुरडीह जैसे गरीब और श्रमिक बाहुल्य क्षेत्र में स्वामी आत्मानंद अंग्रेजी माध्यम स्कूल की स्थापना पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार द्वारा निजी स्कूलों की तर्ज पर निःशुल्क एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से की गई थी। हालांकि वर्तमान में इन स्कूलों की स्थिति को लेकर अव्यवस्था और उपेक्षा के आरोप लगाए जा रहे हैं।
वोरा ने कहा कि स्वामी आत्मानंद अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की स्थिति लगातार चिंताजनक होती जा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि शिक्षकों की भारी कमी, बुनियादी सुविधाओं का अभाव और संसाधनों की किल्लत के बावजूद स्कूलों को पर्याप्त फंड और स्टाफ उपलब्ध कराने के बजाय उन्हें धीरे-धीरे कमजोर किया जा रहा है। उनके अनुसार यदि यही स्थिति बनी रही तो ऐसी सफल योजनाएं धीरे-धीरे बंद होने की कगार पर पहुंच जाएंगी और बच्चों तथा शिक्षकों दोनों का भविष्य असुरक्षित हो जाएगा।

वोरा ने यह भी कहा कि स्वामी आत्मानंद अंग्रेजी माध्यम स्कूल राज्य की शिक्षा व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण और सफल पहल रही है। इन स्कूलों के माध्यम से गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चों को निजी स्कूलों की तर्ज पर निःशुल्क अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा मिली और कम समय में इसके सकारात्मक परिणाम सामने आए। बच्चों के शैक्षणिक स्तर में सुधार हुआ और हजारों परिवारों को अपने बच्चों के भविष्य को लेकर नई उम्मीद मिली। हालांकि उनका आरोप है कि वर्तमान सरकार के दौरान इन जनहितकारी स्कूलों को संसाधनों की कमी और प्रशासनिक उपेक्षा का सामना करना पड़ रहा है, जिससे इस शिक्षा मॉडल की सफलता पर प्रश्नचिह्न लग गया है।
उन्होंने सवाल उठाया कि क्या वास्तव में शिक्षा राज्य सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है, या फिर विकास की सूची में शिक्षा और शिक्षक दोनों को नजरअंदाज कर दिया गया है।